भारत की आज़ादी की लड़ाई में असंख्य वीरों ने अपने जीवन को बलिदान कर दिया था ,मगर आज़ादी मिलने के बाद देश की सत्ता पर काबिज होने वाले नेताओं ने उन शहीदों को याद करना भी मुनासिब नहीं समझा। इसी श्रेणी में अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद का नाम भी रखा जा सकता है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज [27 फरवरी,1931] उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके चरणों में अपना शत -२ नमन करते हैं। भारत की जनता उनके द्वारा भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के किये गए संघर्ष में दिए गए बलिदान का सारा देश हमेशा ऋणी रहेगा।बड़े अफ़सोस की बात है कि जिन लोगों ने आज़ाद भारत की बागडौर सम्भाली उन्हें सिर्फ गांधी और नेहरू के योगदान को ही सर्वोपरि माना और देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले भारत माँ के असंख्य सपूतों का बलिदान उन्हें तुच्छ ही लगा। आज़ाद ने देश के स्वतन्त्रता संग्राम के लिए गांधी के अहिंसा के मार्ग की बजाय हिंसा के मार्ग को सही माना और अंग्रेजों के साथ अपने जीवन की आखरी घड़ी तक सशस्त्र संघर्ष किया।आज़ाद देश की आज़ादी की सशत्र लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारियों के नायक थे और सभी उनको अपना बड़ा मानकर उनके आदेशों का पालन भी करते थे।
आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को इलाहबाद के भंवरा गॉव में पंडित सीता राम तिवारी और जगरानी तिवारी के यहाँ पुत्र के रूप में हुआ। इनका पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था। इनकी शिक्षा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हुई।सन 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने अल्प आयु 15 में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 15 बेंतो की सज़ा पाकर भारत माँ का यह सपूत हमेशा के लिए 'आज़ाद ' के नाम से विख्यात हो गए। वो 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट' रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कमांडर इन चीफ हो गए। इनके दल ने क्रांतिवीरों की मदद हेतु 9 अगस्त ,1925 को काकोरी के पास रेल में जा रहे सरकारी खज़ाने को लूट लिया। आज़ाद भूमिगत होकर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध आज़ादी की लड़ाई की गतिविधिओं का संचालन करते रहे। अंग्रेजी हकूमत ने आज़ाद की गिरफ्तारी के लिए 30 हज़ार रूपए का इनाम का ऐलान कर दिया। आज़ाद ने कसम खाई कि वह जिन्दा जी कभी गिरफ्तार नहीं होंगे।लाठीचार्ज के कारण लाला लाजपत राय की मौत का बदला सांडर्स की लाहौर में आज़ाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर हत्या करके लिया। आज़ाद 8 अप्रैल ,1929 को ऐसेम्बली बम्बकांड के षड्यंत्र में भी शामिल थे। किसी मुखबिरी के कारण 27 फरवरी ,1931 को पुलिस द्वारा आज़ाद के इलाहबाद के एल्फ्रेड पार्क में चारों तरफ से घिर गए। पुलिस के साथ गोलाबारी हुयी और जब उन्होंने यह समझ लिया कि उनका बचना मुश्किल है तो उन्होंने अपनी रिवाल्वर की आखरी गोली खुद को मारकर अपना बलिदान दे दिया। आज़ाद ने प्रण लिया था कि वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे ,अपने इसी प्रण को अपने रिवाल्वर की गोली से मात्र 25 वर्ष की आयु में पूरा किया। इस महान विभूति का सारा देश हमेशा -2ऋणी रहेगा।


















