Tushrapat

Wednesday, 19 February 2014

शिवाजी जैसे हिन्दू वीरों से प्रेरणा लेकर हमें अपनी और अपने धर्म की रक्षा हेतु हमेशा तत्पर रहना चाहिए नाकि हरामी और पाखंडी बाबाओं और कथावाचकों के चककर में पड़कर कायर और भयभीत होकर अपना जीवन काटना चाहिए

क्षत्रपति शिवाजी महाराज भारत के वह इतिहास पुरुष हैं जिन्होंने अपनी वीरता और युधकौशल से मुग़ल साम्राज्य को नाको चने चबवाये और इतिहास के सबसे क्रूर ,कट्टर ,मुसलमान  मुग़ल बादशाह औरंगजेब के घुटने टिकवा कर दक्षिण के बहुत बड़े क्षेत्र को अपने अधिपत्य में लेकर विशाल हिन्दू साम्राज्य की नींव रख दी। यह हिन्दू साम्राज्य का भगवा ध्वज  औरंगज़ेब की इस्लामिक नीति के सीने में में गाड़ कर हमेशा -२ के लिए औरंगज़ेब के उस मनसूबे को धूल -धूसरित कर डाला जिसके तहत वह पुरे भारत का इस्लामिककरण करके जन्नत में गाज़ी की उपाधि पाना चाहता था। भारत माँ के इस वीर योद्धा और हिन्दू राजा क्षत्रपति शिवाजी महाराज के आज [19 फरवरी ,1630 ] जन्म दिवस पर उनके श्री चरणों में हमारा शत -2 नमन है।शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से शिवाजी महाराज का जन्म १९ फरवरी, १६३० को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी का दुर्ग पूना (पुणे) से उत्तर की तरफ़ जुन्नार नगर के पास था। उनका बचपन उनकी माता जिजाऊ के मार्गदर्शन में बीता। वह सभी कलाओ मे माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी । ये भोंसले उपजाति के थे जोकि मूलत: कुर्मी जाति से संबद्धित हे | कुर्मी जाति कृषि संबद्धित कार्य करती हे  | उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे और उनकी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते थीं । उनकी माता जी जीजाबाई जाधव कुल में उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली थी और उनके पिता एक शक्तिशाली सामन्त थे । शिवाजी  महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओँ को भली प्रकार समझने लगे थे। शासक वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-हृदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्ज्वलित हो गयी थी। उन्होंने कुछ स्वामिभक्त साथियों का संगठन किया। अवस्था बढ़ने के साथ विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया।छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् १४ मइ १६४० में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल,पुना में हुआ था ।

           आज हिन्दू धर्म का अस्तित्व अगर दुनिया में है तो वीर शिवाजी का इसमें एक महत्वपूर्ण योगदान है जिन्होंने अपनी तलवार की धार से हिन्दू धर्म को समूल नष्ट करने वाले आततायी मुस्लिम कटटरपंथी शासकों को धड़विहीन कर दिया । आज हिन्दू धर्म के अनुयायिओं को अगर किसी महापुरुष की पूजा करनी चाहिय तो वीर शिवाजी जैसे योद्धाओं की करनी चाहिए , जिन्होंने मंदिरों में आरती करने और कथा -प्रवचनों को सुनने की बजाय अपनी पूरी शक्ति और चतुराई से उन जनूनी शासकों के विरुद्ध युद्ध किया जो इस्लाम के अलावा किसी दूसरे धर्म अनुयायी को जिन्दा ही नहीं देखना चाहते थे। शिवाजी जैसे हिन्दू वीरों से प्रेरणा लेकर हमें अपनी और अपने धर्म की रक्षा हेतु हमेशा तत्पर रहना चाहिए  नाकि हरामी और पाखंडी बाबाओं और कथावाचकों के चककर में पड़कर कायर और भयभीत होकर अपना जीवन काटना चाहिए ,यही धर्म का सन्देश है  और यही हिन्दू होने का वास्तविक अर्थ। आज हिन्दू लोग सिवाय पूजा -पाठ करने और देवताओं के सामने गिड़गिड़ाने में ही अपनी और अपनी आनेवाली नस्लों की सुरक्षा को पुख्ता मान कर अपने आप को धोखा देने में लगा हुआ है। कोई भी देश - कौम और धर्म सिर्फ पूजा -पाठ करने और अपने देवताओं के आगे लेटे रहने से अधिक दिन तक अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता इसके लिए संघर्ष और बलिदान करना ही आवश्यक होता है। यही संकल्प हमें वीर शिवाजी महाराज के जन्मदिवस पर लेना चाहिय। 

शिवाजी एक समर्पित कत्तर हिन्दु थे पर वह् धार्मिक सहिष्णुता के पक्षपाती भी थे । उस्के साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी और मुसलमानों को धर्मपरिवर्तन के लिेए विवश नहीं किया जाता था । कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया । हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था । उस्कि सेना में मुसलमानों की संख्या अधिक थी । पर वह् हिन्दू धर्म का संरक्षक थे । पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था । वह् अपने अभियानों का आरंभ भी अक्सर दशहरा के मौके पर करते थे

















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